नश्वर देह का अनश्वर धर्म

नश्वर देह का अनश्वर धर्म  

 

जिस शरीर को अपना ही खून कल अग्नि को समर्पित कर देने वाला है उस पूरे शरीर को दान नहीं भी करें तो कम से कम जीते जी रक्त, किडनी आदि का दान तो किया ही जा सकता है। देह-दान शब्द सुनते या पढ़ते ही सबसे पहला विचार जो दिमाग में आता है वह है मृत्यु, जो अवश्यंभावी है।

आज नहीं तो कल, कोई पहले तो कोई बाद में लेकिन मृत्यु के नाम से ही मन में भय का संचार होने लगता है। मानव शरीरधारी भगवान राम और कृष्ण को भी समय आने पर यह शरीर त्यागना पड़ा था, जो जन्म के साथ ही स्व-निर्धारित है उससे भय कैसा? न ही इससे बचने का कोई उपाय है। चाहे कोई कितना ही बड़ा बलवान हो, धनवान हो, तपस्वी हो अथवा किसी भी रूप में कितना ही सक्षम हो इससे बच नहीं पाया।

सारे संसार का इतिहास और पुराणों के कथानक इसके साक्षी हैं। प्राचीन या वर्तमान विज्ञान कितना ही उन्नत हो गया हो लेकिन मृत्यु पर विजय हासिल करने का सपना सपना ही है, तब घबराहट क्यों? और जब यह सुनिश्चित है तब इस क्षणभंगुर और अंत में राख के ढेर में बदलने वाले शरीर या उसके अंगों को किसी जरूरतमंद के लिए समर्पित कर देने में हर्ज ही क्या है? और जिसे पाने के लिए आपने स्वयं कोई प्रयास नहीं किया है या धन खर्च नहीं किया है यह प्रकृति या ईश्वर ने अनमोल उपहार के रूप में आपको जीवन के साथ दिया है तब इस नाशवान शरीर से अंत समय में अगर किसी मानव को जीवनदान मिले तो इससे बड़ी मानव जीवन की सार्थकता और क्या हो सकती है?

अपने सामने से गुजरने वाले उन मानव जीवन को गौर से देखें जिनकी आँखें नहीं हैं या शरीर की कोई लाचारी ढोते हुए भी जिंदगी जी रहे हैं। शायद हो सकता है कि तब आपको ईश्वर प्रदत्त अपने इस अनमोल सुंदर शरीर का मोल अनुभव हो सकें। तात्पर्य यह है कि ईश्वर ने आपको यह अनमोल उपहार निःशुल्क दिया है और जिन्हें नहीं दिया है, उनके लिए कुछ करने के लिए दिया है।

जिस शरीर को अपना ही खून कल अग्नि को समर्पित कर देने वाला है उस पूरे शरीर को दान नहीं भी करें तो कम से कम जीते जी रक्त, किडनी आदि का दान तो किया ही जा सकता है और मरणोपरांत भी नेत्र, अस्थि, त्वचा आदि का दान भी किया जा सकता है। दुर्घटना से मरणासन्न घायल अथवा मस्तिष्क मृत्यु वाले एवं वेंटीलेटर पर रखे जाने वाले व्यक्ति के तो लगभग सारे अंग किसी जरूरतमंद एक नहीं छह-आठ लोगों के जीवन को आधार दे सकते हैं।

इसके लिए आवश्यकता है केवल आपके दृढ़निश्चय या संकल्प की अथवा परोपकार के निमित्त अपने आपको समर्पित करने के लिए उस समर्पण भाव की जिस भाव के वशीभूत होकर हमारे पितृ पुरुष महर्षि दधीचि ने दूसरों के दुःख निवारण के लिए अपने प्राणों की आहुति देकर एक आदर्श परंपरा की नींव रखी। श्रीमद्भागवत में महर्षि दधीचि को उद्धृत करते हुए कहा गया है - 'एतावान व्यतो धर्मः पुण्य श्लौके रूपासितः। यो भूत शोक हर्षाभ्यामात्मा शोचति हृष्यति॥'

अर्थात्‌ जो मनुष्य दूसरों के दुःख में दुःखी और सुख में सुखी होता है उसकी पुण्यकीर्ति पुरुषों के द्वारा सेवित यह अविनाशी धर्म है। श्रीमद्भागवत पुराण में उद्धृत महर्षि दधीचि के हृदय के इस उद्गार को हम सभी दाधीच बंधु हृदयंगम कर इसका अनुसरण करें एवं इसी क्षण ऐसा कोई संकल्प लेवें। जीवनचर्या बड़ी व्यस्त है, हो सकता है कल तक हम यह भूल जावें कि ऐसा कुछ करने का हमने कभी विचार किया था।

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